राजनीति
MP: शिवराज सिंह के इस नए रिकॉर्ड से BJP अचंभित, चौथी बार भी संभालेंगे कमान?
लगातार तीसरी बार मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री पद सम्भाल रहे शिवराजसिंह चौहान ऐसे एक मात्र स्टार प्रचारक हैं, जो अपने ही राज्य में अपनी तीसरी पारी के आधे कार्यकाल में पार्टी को छह विधानसभा और एक लोकसभा चुनाव में अपने दम पर विजयी दिला चुके हैं। हाल में एक सासंद के निधन से रिक्त हुई लोकसभा के सीट पर भी उनको किला लड़ना पड़ेगा। वे प्रदेश के ऐसे पहले मुख्यमंत्री भी हैं, जिनके एक ही कार्यकाल में सात उपचुनाव हो चुके हैं,और अभी आधा कार्यकाल बाकी है।
सन् 2013 के चुनावी समर जीत कर तीसरी बार भाजपा को सत्ता में लाने वाले शिवराज सिंह चौहान अपनी रण कौशल का लोहा राजनीतिक दिग्ग्जों को मानवा दिया था। उस समय तक शिवराज के साथ अनेक सहयोगी भी थे और राजनैतिक टीकाकार और ब्यूरोक्रेसी भी मान रही थी कि शिवराज को सरकार के प्रतिरोधात्मक वोटों का सामना करना होगा और बीजेपी सरकार के लौटने में मुश्किलें आएंगी। इन तमाम कयासों को झुठलाते हुए शिवराज सिंह ने ऐसी रणनीति बुनी कि शिवराजसिंह के नाम मध्य प्रदेश लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड हो गया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अपने मधुर रिश्ते और मिलनसारिता से प्रदेश की जनता का दिल जीतने वाले शिवराज ने अपनी तीसरी पारी में अपने लिए आगे आने वाली मुसीबतों को साफ़ करने का भी काम किया। इसी दौरान उनकी ही वरिष्ठतम सांसद श्रीमती सुमित्रा महाजन को देश की संसद का स्पीकर चुना गया और उनके ही सहयोगी मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय म्हासचिव मनोनीत किया गया। निश्चित ही इन मनोनयन में शिवराज की सहमती रही होगी।
सत्ता संभालने के बाद 2014 में तीन विधानसभा सीटों विजयराघवगढ, बोहरीबन्द और आगर में उप चुनाव उनके सामने थे। इन सीटों पर वे अपनी ताकत के साथ उतरे और तीनों ही सीटे भाजपा के खाते में आई। इन सीटों के उपचुनाव से शिवराज सिंह चौहान अभी निपट भी नहीं पाए थे कि देवास विधानसभा और रतलाम संसदीय सीट रिक्त हो गई। यह दोनों ही सीट भाजपा के खाते की थी। 2015 में इन दोनों सीटों में उपचुनाव घोषित हुए।
इधर, रतलाम संसदीय सीट सबसे प्रतिष्ठा की थी, जो कांग्रेस की थी और करीब दो दश्कों बाद 2014 के आम चुनाव में यह भाजपा के खाते में आई थी। उपचुनाव में यह सीट फिर से कांग्रेस के खाते में चली गई. ये वो समय था जब बिहार में बीजेपी दिल्ली के बाद लगातार हार गई थी। वहीं देवास विधानसभा सीट भाजपा के नाम पर ही रही, जरूर यह भाजपा के वोट में कमी के रूप में देखा जा सकता है। 2016 में मैहर और घोंडा डोंगरी के उपचुनाव में अपनी ताकत झोंकी पड़ी। भाजपा ने दोनों ही सीटों में जीत हासिल की। मैहर जो मूलत: कांग्रेसी गढ़ की सीट थी उपचुनाव में शिवराज सिंह के राजनीतिक कौशल से भाजपामय कर दिया।
इन उपचुनाव के बाद भी अभी प्रदेश में उपचुनाव का मौसम खत्म नहीं हुआ है। शहडोल से सांसद दलपत सिंह परस्ते के निधन के बाद अब साल के आखिरी में उपचुनाव यहां होगा। घोड़ाडोंगरी उपचुनाव के परिणाम से राहत की सांस लेकर अब फिर शिवराज सिंह को इस सीट पर जीत हासिल करने के लिए जुटना होगा, क्योंकि यह सीट भाजपा के लिए रतलाम संसदीय सीट की तरह ही प्रतिष्ठा की है।
इधर, तीसरी बार प्रदेश की सत्ता सम्भलाने के बाद अब तक छह विधानसभा सीटों और एक संसदीय उपचुनाव से प्रदेश में हो चुके हैं। साल के जाते जाते फिर एक उपचुनाव से दो चार होना होगा। अभी तक हुए सभी उपचुनाव में सिर्फ एक संसदीय उपचुनाव में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा है। सम्भवतः वे प्रदेश के ऐसे पहले मुख्यमंत्री भी हैं, जिनके एक ही कार्यकाल में सात उपचुनाव हो चुके हैं और अभी आधा कार्यकाल बाकी है।
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