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पाकिस्तान की बेटियों के मन की बात- ‘हम हिंदुस्तान को अपना समझकर आए थे…’

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मैं फिरोजा हूं (बदला हुआ नाम)। कराची की रहने वाली हूं। अलीगढ़ में मेरा निकाह हुआ है। अब तो जब भी कश्‍मीर और देश के दूसरे हिस्‍सों में कोई वारदात होती है तो दूसरे कसूरवारों की तरह हम भी उसके लिए अपने को कसूरवार मान लेते हैं। इससे फर्क क्‍या पड़ता है। हम खुद को कसूरवार नहीं भी मानें तो दूसरे लोग मानने लगते हैं। यकीन नहीं होता तो अभी हम पाकिस्‍तान जाने के लिए वीजा आवेदन करते हैं, फिर देखों कैसे अजीब-अजीब सवालों के दौर से गुजरना पड़ता है। अगर भूले से किसी घटना के बाद वीजा के लिए आवेदन करते हैं तो ऐसे सवाल किए जाते हैं जैसे उस घटना को हम ही अंजाम देकर पाकिस्‍तान भाग रहे हैं।

पाकिस्तान की बेटियों के मन की बात-

उस दिन दोपहर को मैंने अपने शौहर से कश्‍मीर में हुई आतंकवादियों के हमले की खबर सुनी थी। खबर सुनते ही मेरे मुंह से निकला था कि अब एक और घटना का इल्‍जाम अपने ऊपर लेना होगा। क्‍योंकि नवम्‍बर में हमारा पाकिस्‍तान जाने का प्‍लान था। इस बार तो मायके गए हुए करीब ढाई साल हो गए। मेरे भाई के बेटा हुआ है। लेकिन अभी तक उसे सिर्फ फोटो में ही देखा है। बड़ा मन है कि उसे गोद में लूं और अपने हाथों से उस मासूम को कुर्ता-पायजामा पहनाऊं। अब्‍बू भी बहुत बीमार रहने लगे हैं। कश्‍मीर में हुए हमले के बाद लगा कि दो-तीन महीने में शायद माहौल कुछ हल्‍का हो जाएगा।

लेकिन जब से हमारी फौज द्वारा एलओसी पार जाकर हमले की खबर सुनी है तो ऐसा लगा रहा है कि अब तो हाल-फिलहाल जाना ही मुमकिन नहीं होगा। अब तो हालात और भी खराब हो जाएंगे। कम तो पाकिस्‍तान वाले भी नहीं हैं। जब कराची में हम अपनी आमद कराने जाते हैं तो वहां भी तरह-तरह के सवाल पूछे जाते हैं। शादी का मामला तो था ही लेकिन रिश्‍ता पक्‍का होते ही यह ख्‍याल भी दिल में था कि सही मायनों में हिन्‍दुस्‍तान ही हमारा घर है। मेरे परदादा-परदादी दिल्‍ली के रहने वाले थे। इसलिए हिन्‍दुस्‍तान को अपना समझकर आई थी। ऐसा तो बहुत कम ही होता है जब हम वीजा मांगे और देश में किसी घटना की चर्चा न चल रही हो या घटना नहीं हुई हो।

मेरी शादी को आठ साल हो चुके हैं। दो लड़की और एक लड़का है। बच्‍चे अभी छोटे हैं तो दो देशों के मसलों को नहीं समझ पाते हैं। इसलिए उन्‍हें तो यही लगता है कि दूसरे बच्‍चों की तरह से हम अम्‍मी से नानी के यहां चलने की जिद्द करेंगे और अम्‍मी चल देंगी। पहले की तरह से अब हर बरस मायके जाना नहीं होता है। बड़ी मुश्‍किल से दो साल में एक बार जाना हो पा रहा है। नवम्‍बर में जाने का प्रोगाम बनाते हैं, लेकिन इन दो घटनाओं के बाद से इस बार जाने जैसी कोई बात बनती हुई नहीं दिख रही है।