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निजता का अधिकार मौलिक हनन है या नहीं: अब सुप्रीम कोर्ट करेगा तय

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निजता के अधिकार की संवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच ने आज पूरा दिन सुनवाई की. कोर्ट को ये तय करना है कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है या नहीं. सुनवाई कल भी जारी रहेगी. दरअसल, आधार कार्ड योजना की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई से पहले सुप्रीम कोर्ट ये तय कर लेना चाहता है कि निजता मौलिक अधिकार है या नहीं. ऐसा इसलिए क्योंकि इस योजना का विरोध इस आधार पर किया जा रहा है कि आधार के लिए बायोमेट्रिक रिकॉर्ड लेना निजता के अधिकार का हनन है.

आज याचिकाकर्ता पक्ष की तरफ से इस अधिकार के पक्ष में दलील रखी गई कि निजता, सम्मान से जीने के अधिकार का ही एक हिस्सा है. याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम, श्याम दीवान और सोली सोराबजी ने जिरह की. सुब्रमण्यम ने कहा, “संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 को अगर एक साथ देखा जाए तो नागरिक के मौलिक अधिकारों का दायरा बहुत बड़ा हो जाता है. अगर ये कहा जाए कि निजता कोई अधिकार नहीं है तो ये बेमतलब होगा.”

श्याम दीवान की दलील थी, “मेरी आँख और फिंगर प्रिंट मेरी निजी संपत्ति हैं. मुझे इनकी जानकारी किसी को देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. सरकार को भी ये जानकारी लेने का हक नहीं है.”

सोली सोराबजी ने कहा, “निजता के अधिकार का ज़िक्र संविधान में नहीं होने से कोई असर नहीं पड़ता. संविधान से लोगों को मिले अधिकारों को देखें तो कोर्ट ये आसानी से कह सकती है कि निजता एक मौलिक अधिकार है. ठीक वैसे ही जैसे प्रेस की आज़ादी का अलग से ज़िक्र नहीं है. लेकिन इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा माना जाता है.”

याचिकाकर्ताओं की तरफ से ये दलील भी दी गई कि एम पी शर्मा और खड़क सिंह केस आपराधिक मामले से जुड़े थे. उनमें पुलिस को हासिल तलाशी और निगरानी के अधिकार पर चर्चा हुई थी. उस आधार पर ही निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं माना गया. बाद में गोविंद बनाम एमपी और मेनका गांधी जैसे केस में आम नागरिक के अधिकारों पर बात हुई. कोर्ट का निष्कर्ष पुराने मामलों से अलग रहा.

सुनवाई के दौरान जजों ने कई सवाल पूछे. 9 जजों की बेंच के सदस्य जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने कहा, “एक ऐसा गणतंत्र जिसका लिखित संविधान है, उसमें निजता को मौलिक अधिकार का दर्जा नहीं है, ये मानना बहुत मुश्किल है.”

हालांकि, बेंच के सदस्य जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा, “अगर हम ये मान लें कि निजता एक मौलिक अधिकार है तो नाज़ फाउंडेशन मामले में आया फैसला कैसे देखा जाएगा?” गौरतलब है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2 वयस्कों के बीच आपसी सहमति से एकांत में बने समलैंगिक संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर रखने से मना कर दिया था.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “पति-पत्नी अपने बेडरूम में किस तरह रहते हैं, ये उनका निजी मामला है. उसी तरह सरकार ये तय कर सकती है कि सभी बच्चे स्कूल जाएं. लेकिन बच्चे को किस स्कूल में भेजना है, ये चुनना उसके माता-पिता का अधिकार है.” बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने आगे कहा, “निजता के अधिकार को हर मामले में अलग-अलग देखना होगा. हर सरकारी कार्रवाई को निजता के नाम पर रोका नहीं जा सकता. इस अधिकार के दायरे तय किये जाने चाहिए.”

कल केंद्र सरकार की तरफ से एटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल दलीलें रखेंगे. सरकार ने अब तक ये कहा है कि निजता एक प्राकृतिक अधिकार है. साथ ही ये एक सामाजिक अवधारणा भी है. इसका सम्मान किया जाना चाहिए. लेकिन इसे मौलिक अधिकार का दर्जा नहीं दिया जा सकता. अगर ऐसा होता तो संविधान निर्माताओं ने इसे संविधान में जगह दी होती.

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