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8 फरवरी के बाद ना टले सुनवाई, इसके लिए कोर्ट ने दिए ये निर्देश
बाबरी मस्जिद विध्वंस को आज 25 साल पूरे हो गए हैं. ठीक एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर निर्णायक सुनवाई शुरू हुई. सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में सुन्नी बोर्ड की ओर से पक्ष रखते हुए वकील कपिल सिब्बल ने इस केस की सुनवाई को 2019 तक टालने की बात कही, लेकिन SC ने इस दलील को मानने से इंकार कर दिया है. मामले की अगली सुनवाई 8 फरवरी, 2018 को होगी, कोर्ट ने सभी से कहा है कि वह पूरी तैयारी से आएं क्योंकि अब तारीख आगे नहीं बढ़ेगी.
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने ?
सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि बाहर क्या चल रहा है, इससे फर्क नहीं पड़ता है. कोर्ट तथ्यों पर केस को सुनता है. इसके अलावा कोर्ट ने बड़ी बेंच की मांग को भी ठुकरा दिया, उन्होंने कहा कि सुनवाई 3 जजों की मौजूदा बेंच ही करेगी, मामला संविधान सभा को नहीं भेजा जाएगा.
कोर्ट ने वकीलों से कहा कि 8 फरवरी तक अपने सभी दस्तावेज तैयार कर लें, क्योंकि उसके बाद तारीख को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा. कोर्ट ने कहा कि अगर वकीलों को मामले को लेकर कोई भी समस्या आती है, तो वह सीधे तौर पर CJI से संपर्क कर सकते हैं.
किसने क्या दिया तर्क ?
कपिल सिब्बल की दलील
सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पक्ष रखते हुए कपिल सिब्बल ने दलील दी कि सुनवाई को जुलाई 2019 तक टाल दिया जाए, क्योंकि मामला राजनीतिक हो चुका है. कपिल सिब्बल और राजीव धवन की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि इस मामले की जल्द सुनवाई सुब्रमण्यम स्वामी की अपील के बाद शुरू हुई, जो कि इस मामले में कोई पार्टी भी नहीं हैं.
सिब्बल ने कहा कि कोर्ट को देश में गलत संदेश नहीं भेजना चाहिए, बल्कि एक बड़ी बेंच के साथ मामले की सुनवाई करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि राम मंदिर का निर्माण बीजेपी के 2014 के घोषणापत्र में शामिल है, कोर्ट को बीजेपी के जाल में नहीं फंसना चाहिए. कपिल सिब्बल ने कोर्ट से कहा कि देश का माहौल अभी ऐसा नहीं है कि इस मामले की सुनवाई सही तरीके से हो सके. क्यों इस मसले को लेकर हड़बड़ी में सुनवाई हो रही है.
राम लला की ओर से क्या बोले पक्षकार
दूसरी ओर राम लला की ओर से वकीलों ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दूसरे पक्षकार कोर्ट को केस का राजनीतिक प्रभाव ध्यान में रखने को कह रहे हैं. रामलला का पक्ष रख रहे हरीश साल्वे ने कोर्ट में बड़ी बेंच बनाने का विरोध किया और कहा कि बेंच को कोर्ट के बाहर चल रही राजनीति पर ध्यान नहीं देना चाहिए. यूपी सरकार की ओर से पेश हो रहे तुषार मेहता ने कहा कि जब दस्तावेज सुन्नी वक्फ बोर्ड के ही हैं तो ट्रांसलेटेड कॉपी देने की जरूरत क्यों हैं?
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