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बूचड़खाने का पेशा छोड़ करने लगे गोसेवा, 58 साल के शब्बीर को मिला पद्मश्री
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने शुक्रवार को पद्म पुरस्कारों की घोषणा कर दी. इस बार कुल 112 पद्म पुरस्कार दिए जा रहे हैं, जिसमें से 94 लोगों को पद्मश्री, 14 लोगों को पद्म भूषण और 4 हस्तियों को पद्म विभूषण से नवाजा जाएगा. ये पुरस्कार कला, सामाजिक सेवा, साइंस, इंजीनियरिंग, ट्रेड एंड इंडस्ट्री, चिकित्सा, साहित्य और शिक्षा, खेल और नागरिक सेवा समेत किसी भी क्षेत्र में विशेष उल्लेखनीय काम करने वालों को दिए जा रहे हैं. पद्म पुरस्कार पाने वालों में एक ऐसा शख्स भी शामिल है, जो पहले बूचड़खाना चलाता था और बाद में गोमाता का सेवक बन गया था.
महाराष्ट्र के बीड जिले के शिरूर कासार तालुका निवासी 58 वर्षीय शब्बीर सैय्यद को सामाजिक कार्य और पशु कल्याण के लिए पद्मश्री देने की घोषणा की गई है. वो अपने परिवार के साथ पिछले 50 साल से गाय की सेवा कर रहे हैं. वो ऐसे इलाके से आते हैं, जहां पर कई बार पानी की किल्लत बनी रहती है. उस इलाके में कई बार जानवरों की भूख-प्यास से मौत तक हो जाती है, लेकिन शब्बीर इन तमाम दिक्कतों के वाबजूद गायों की सेवा पूरी शिद्दत से करते हैं. दिलचस्प बात यह है कि वो काटने के लिए न तो गाय को बेचते हैं और न ही दूध. वो गाय के गोबर को बेचकर पूरा खर्च निकाल लेते हैं. बताया जा रहा है कि गाय के गोबर बेचकर वो हर साल 70 हजार रुपये तक कमा लेते हैं.
इसके अलावा अगर वो बैल बेचते हैं, तो सिर्फ किसानों को. इतना ही नहीं, शब्बीर सैय्यद इसके लिए बाकायदा कागज में उस किसान से लिखवा लेते हैं कि वह कभी कसाई को नहीं बेचेंगे. इसके लिए वो काफी डिस्काउंट भी देते हैं. शब्बीर सैय्यद का कहना है कि अगर कोई गाय या उसका बच्चे की मौत हो जाती है, तो उनको बहुत पीड़ा होती है. उनका लगता है कि उनके परिवार का एक सदस्य इस दुनिया से चला गया है.
गोमाता की सेवा में शब्बीर सैय्यद का साथ उनका पूरा परिवार देता है. इस परिवार की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है, लेकिन फिर सैय्यद गोमाता की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं. वर्तमान में शब्बीर सैय्यद के पास 165 गोवंश हैं. गायों को पालने और उनकी सेवा करने की परंपरा शब्बीर सैय्यद के पिता बुदन सैय्यद ने 70 के दशक में शुरू की थी.
शब्बीर सैय्यद का कहना है कि मेरे पिता बुदन सैय्यद इससे छुटकारा पाना चाहते थे. लिहाजा उन्होंने बूचड़खाना बंद करके गोरक्षा और गोसेवा का काम शुरू कर दिया. उन्होंने सिर्फ दो गायों से इसकी शुरुआत की थी. इसके बाद साल 1972 में शब्बीर सैय्यद अपने पिता के पद चिन्हों पर चलते हुए 10 गायों को खरीदा और उनकी सेवा शुरू कर दी. इसके अलावा शब्बीर का परिवार बीफ भी नहीं खाता है. शब्बीर सैय्यद की पत्नी आशरबी, बेटे रमजान और यूसुफ और बहू रिजवान और अंजुम भी बीफ नहीं खाते हैं. ये सभी मिलकर गायों की खूब सेवा करते हैं.
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