इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देवरिया पुलिस की मनमानी और कार्यशैली पर बेहद सख्त रुख अपनाया है. पुलिस थाने में चार नागरिकों को करीब 11 दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखने के मामले पर नाराजगी जताते हुए हाईकोर्ट ने पीड़ित पक्ष को मुआवजा (Compensation) देने का बड़ा आदेश जारी किया है. यह कड़ा फैसला जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ताओं द्वारा दाखिल ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका’ (Habeas Corpus Petition) पर सुनवाई करते हुए सुनाया.
कैमरा खराब होने की बात पर कोर्ट नाराज
पुलिस की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित समय का सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं है, क्योंकि थाने का कैमरा खराब था. इस जवाब के बाद हाईकोर्ट ने देवरिया के एसपी और थाना प्रभारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया था.सुनवाई के दौरान दोनों अधिकारी कोर्ट में मौजूद रहे. अदालत ने सीसीटीवी व्यवस्था में इस तरह की लापरवाही को गंभीरता से लिया और पूछा कि अगर थाने में निगरानी के लिए लगाए गए कैमरे ही काम नहीं कर रहे थे तो जिम्मेदार अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई.
11 दिनों की अवैध हिरासत
देवरिया पुलिस पर महेंद्र गौर और तीन अन्य लोगों को 13 अप्रैल से 24 अप्रैल 2026 के बीच बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के थाने में अवैध रूप से बंद रखने का गंभीर आरोप लगा.
बेंच का सख्त रुख
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की दो जजों की पीठ ने मामले को नागरिक अधिकारों का गंभीर हनन माना और पुलिस को पीड़ितों को मुआवजा देने का निर्देश दिया.
एसपी देवरिया व थाना प्रभारी पेश
हाईकोर्ट के कड़े समन के बाद देवरिया के पुलिस अधीक्षक (SP) और गौरी बाजार थाना प्रभारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होना पड़ा.
‘CCTV खराब है’ के बहाने पर सवाल
जब हाईकोर्ट ने थाने की सीसीटीवी फुटेज जमा करने का आदेश दिया, तो पुलिस ने दावा किया कि 12 अप्रैल से ही कैमरे खराब थे। इस पर अदालत ने तीव्र नाराजगी जताते हुए इसे सबूत छुपाने का प्रयास माना.
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका
पीड़ितों के परिजनों ने पुलिस द्वारा अवैध रूप से गायब रखने और हिरासत में लेने के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
