फेसबुक और इंस्टाग्राम के एल्गोरिदम को लेकर सरकार और Meta के बीच तनातनी जारी है. बीते कल में मेटा ने पीएम मोदी की वीडियो सोशल मीडिया से हटाने पर माफी मांगी है. अब दोनों पक्षों के बीच में बातचीत के बाद सोशल मीडिया क्रिएटर्स आने वाले समय में प्लेटफॉर्म का कंटेंट रैंकिंग सिस्टम में ज्यादा पारदर्शी और बेहतर होने की उम्मीद कर रहे हैं.
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के मुताबिक एल्गोरिदम सिस्टम काफी हद तक तय करता है कि किसी यूजर को उसकी Feed या Reels में कौन-सा कंटेंट दिखाई देगा. यानी किसी वीडियो को ज्यादा लोगों तक पहुंच मिलेगी या वह कुछ ही लोगों तक सीमित रह जाएगा. हाल ही में सोशल मीडिया से पीएम मोदी की वीडियो हट, इससे पहले भी मेटा के काम करने के तरीके और एल्गोरिदम सिस्टम पर सवाल उठते रहे हैं. ऐसे में अब सरकार चाहती है कि भारत में काम कर रहे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भारतीय कानूनों और नियमों के हिसाब से काम करें. बता दें हाल ही में इसी सिलसिले में Meta के अधिकारियों के साथ सरकार की बातचीत हुई है.
एल्गोरिदम सुधरा तो क्या बदलेगा?
इसका फायदा खास तौर पर छोटे क्रिएटर्स को हो सकता है, जिनके पास बड़े फॉलोअर्स नहीं हैं लेकिन उनका कंटेंट लोगों को पसंद आता है. दरअसल, होगा ये कि अगर Meta अपने सिस्टम में सुधार करता है और कंटेंट की पहचान तथा रैंकिंग को ज्यादा बेहतर बनाता है तो अच्छी क्वालिटी वाले ओरिजिनल कंटेंट को सही ऑडियंस तक पहुंचने का मौका बढ़ सकता है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर इंफ्लुएंसर की Reel वायरल होने लगेगी. या वीडियो की क्वालिटी, लोगों की रुचि, वॉच टाइम, शेयर और दूसरे कई संकेत आगे भी महत्वपूर्ण रहेंगे.
क्या इंफ्लुएंसर्स की कमाई बढ़ सकती है?
अब सरकार की बैठक के बाद सबके मन में सवाल है कि क्या इंफ्लुएंसर्स की कमाई बढ़ सकती है? एक्सपर्ट का मानना है कि संभावना है, लेकिन यह सीधे तौर पर तय नहीं है. दरअसल, मसला ये है कि अगर किसी क्रिएटर की वीडियो ज्यादा सही यूजर्स तक पहुंचती है और उसके Views, Watch Time तथा Engagement बढ़ते हैं तो भविष्य में उसके लिए कमाई के मौके भी बढ़ सकते हैं. इसक अलावा ज्यादा पहुंच का मतलब ब्रांड डील, विज्ञापन, एफिलिएट लिंक, सब्सक्रिप्शन और दूसरे डिजिटल कमाई के रास्तों में बेहतर अवसर हो सकता है.
छोटे इंफ्लुएंसर्स को क्या फायदा हो सकता है?
अभी बड़ी संख्या में फॉलोअर्स रखने वाले क्रिएटर्स को स्वाभाविक रूप से ज्यादा शुरुआती पहुंच मिल सकती है. अगर एल्गोरिदम कंटेंट की गुणवत्ता और यूजर की पसंद को ज्यादा महत्व देता है तो छोटे क्रिएटर्स के लिए भी रास्ता खुल सकता है.
क्या इससे वायरल कंटेंट की तस्वीर बदलेगी?
संभव है. ऐसा हो जाए, साथ ही बता दें एल्गोरिदम में बदलाव का सबसे सीधा असर यह होगा कि प्लेटफॉर्म किसी कंटेंट को किस आधार पर ज्यादा लोगों तक पहुंचाता है. अगर सिस्टम स्पैम, बॉट्स और कम गुणवत्ता वाले कंटेंट को बेहतर तरीके से पहचानता है तो वास्तविक क्रिएटर्स के कंटेंट को प्रतिस्पर्धा में फायदा मिल सकता है लेकिन यहां भी वायरल होने की कोई तय गारंटी नहीं होगी.
सरकार आखिर Meta से क्या चाहती है?
सरकार की चिंता सिर्फ इंफ्लुएंसर्स की Reach तक सीमित नहीं है. हाल ही में हुई बातचीत में सरकार ने मेटा को डीपफेक, बच्चों से जुड़े आपत्तिजनक कंटेंट और बॉट्स जैसे गंभीर मुद्दे पर काम करने की सलाह दी है. वहीं, Meta ने भी ऐसे कंटेंट के खिलाफ अपनी कार्रवाई और पहचान व्यवस्था को मजबूत करने की बात कही है.
