दुनिया की सबसे तेज और अचूक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ को अब पहली बार पूरी तरह से भारत में निर्मित ‘वारहेड’ (विस्फोटक वाला मुख्य हिस्सा) मिलने जा रहा है. नागपुर स्थित निजी क्षेत्र की कंपनी ‘सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड’ (SDAL) भारतीय रक्षा बलों को इस पहले स्वदेशी वारहेड की डिलीवरी देगा..
अब तक ब्रह्मोस मिसाइल के लॉन्चर, एयरफ्रेम और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम का तो स्वदेशीकरण हो चुका था, लेकिन टारगेट को नेस्तनाबूद करने वाले सबसे संवेदनशील हिस्से यानी वारहेड के लिए भारत मुख्य रूप से रूस की सप्लाई चेन पर निर्भर था. इस स्वदेशी वारहेड की डिलीवरी के साथ ही भारत ने विदेशी निर्भरता के चक्रव्यूह को पूरी तरह तोड़ दिया है.
क्या होता है वारहेड और क्यों यह तकनीक है इतनी संवेदनशील?
सैन्य विज्ञान की भाषा में समझें तो मिसाइल के दो मुख्य भाग होते हैं- पहला इंजन (जो उसे उड़ाकर ले जाता है) और दूसरा वारहेड (जो असल तबाही मचाता है). ब्रह्मोस का सामान्य संस्करण 200 किलोग्राम और इसका वायुसेना वाला वर्जन (ब्रह्मोस-ए) लगभग 300 किलोग्राम का वारहेड ढो सकता है.
यह स्वदेशी वारहेड ‘सेमी-आर्मर पियर्सिंग हाई एक्सप्लोसिव’ तकनीक पर आधारित है. इसका मतलब ये है कि यह मिसाइल जब दुश्मन के किसी बंकर, कमांड सेंटर या युद्धपोत से टकराएगी, तो पहले उसकी मजबूत रक्षात्मक बाहरी परत या लोहे के कवच को चीरते हुए अंदर घुसेगी और फिर उसके पेट में जाकर विस्फोट करेगी. ऐसी सटीक इंजीनियरिंग और फ्यूजिंग सिस्टम विकसित करना दुनिया के गिने-चुने देशों के बस की ही बात है.
दुनिया भर में बढ़ेगी भारत की धाक
नागपुर से डिलीवरी मिलने के बाद इस स्वदेशी वारहेड को सीधे चंडीगढ़ स्थित डीआरडीओ (DRDO) की प्रमुख प्रयोगशाला ‘टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी’ (TBRL) भेजा जाएगा. वहां वैज्ञानिक इसके विस्फोटक प्रदर्शन, सुरक्षा मानकों, टर्मिनल इफेक्ट और ऑपरेशनल विश्वसनीयता के कड़े और अंतिम तकनीकी परीक्षण (ट्रायल्स) करेंगे, जिसके बाद इसे सेना में पूरी तरह शामिल कर लिया जाएगा.
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्वदेशीकरण से न सिर्फ किसी अंतरराष्ट्रीय संकट के समय रूस से आने वाली सप्लाई चेन रुकने का खतरा खत्म हो गया है, बल्कि मिसाइल की निर्माण लागत में भी भारी कमी आएगी. भारत इस समय फिलीपींस को ब्रह्मोस का निर्यात कर रहा है और कई अन्य देश भी कतार में हैं. मिसाइल के शत-प्रतिशत भारतीयकरण होने से भारत बिना किसी विदेशी अड़चन या वीटो के इसका ताबड़तोड़ निर्यात कर सकेगा, जिससे वैश्विक रक्षा बाजार में भारत का डंका बजना तय है.
