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महंगा होगा होम लोन, बढ़ सकती है EMI, आज से RBI का रेपो रेट पर मंथन शुरू

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की मौद्रिक समीक्षा बैठक आज से शुरू हो गई है. 5 अक्टूबर से 7 अक्टूबर तक चलने वाली इस MPC मीटिंग में ब्याज दरों पर  मंथन होगा. रेपो रेट बढ़ेंगे, स्थिर रहेंगे या उसमें कटौती हो, इसपर एमपीसी बैठक में चर्चा होगी. 7 अक्टूबर को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर संजय मल्होत्रा (Sanjay Malhotra) ब्याज दर पर फैसले का ऐलान करेंगे.

बढ़ सकता है रेपो रेट, लोन की ब्याज दर में बढ़ोतरी  

RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की तीन दिन की मीटिंग आज यानी 5 अक्टूबर से शुरू होगी. इस बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है. अधिकांश एक्सपर्ट्स यहीं मान रहे हैं कि इस बार इस बार रिजर्व बैंक रेपो रेट में 0.25% की बढ़ोतरी कर सकता है.

महंगा हो जाएगा होम-कार लोन 

रिजर्व बैंक अगर रेपो रेट में बढ़ोतरी करता है, तो फरवरी 2023 के बाद रेपो रेट में होने वाली यह पहली बढ़ोतरी होगी. वहीं रेपो रेट 5.25% से बढ़कर 5.50% पर पहुंच जाएगा. इससे पहले आरबीआई ने 2025 में लगातार 4 बार रेपो रेट में कुल 1.25% कटौती की. इसे 6.50% से घटाकरह 5.25% कर दिया . उसके बाद से रेपो रेट स्थिर बना हुआ है, लेकिन इस बार बदलते वैश्विक हालात, बढ़ती महंगाई के बीच ब्याज दर बढ़ने की आशंका बढ़ गई है.

क्यों घटता-बढ़ता है रेपो रेट 

रेपो रेट वो ब्याज दर होता है, जिस इंटरेस्ट रेट पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया बैंकों को पैसे उधार देता है. अगर रेपो रेट बढ़ता है, तो बैंकों को मिलने वाला कर्ज महंगा हो जाता है. बैंक इस बढ़े कर्ज की लागत का बोझ अपने ग्राहकों पर डालते हैं और होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें बढ़ा देते हैं. ब्याज दर बढ़ने से ईएमआई बढ़ जाती हैं.  बोझ सिर्फ लोन और EMI पर नहीं पड़ता, बल्कि FD पर मिलने वाली ब्याज दर भी प्रभावित होती है. लोन महंगा होने के साथ-साथ बैंक जमाकर्ताओं के FD दरों में भी बढ़ोतरी कर सकते हैं.

रिजर्व बैंक मंहगाई को कंट्रोल करने के लिए ब्याज दर में बढ़ोतरी करता है. जब महंगाई बढ़ने लगती है, तो सेंट्रल बैंक ब्याज दर को  बढ़ाकर बाजार में करेंसी के फ्लो को कम करने की कोशिश करता है. रेपो रेट बढ़ने से बैंकों को मिलने वाला कर्ज महंगा होता, बैंक ब्याज दर बढ़ाकर लोन महंगा कर लेते हैं, लोग महंगा लोन लेने से परहेज करते हैं और अर्थव्यवस्था में मनी फ्लो कम होता है. लोग अपने खर्च में कमी करते है, जिससे डिमांड कम होती है और महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिलती है.

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